पीपली की खेती करेगी आपको मालामाल

लॉन्ग पेपर/पीपली

पौध परिचय: पिप्पली ( वानस्पतिक नाम : Piper longum), पाइपरेसी परिवार का पुष्पीय पौधा है। इसकी खेती इसके फल के लिये की जाती है। पिप्पली की पत्तियाँ 5-9 सेमी लंबी और 5 सेमी चौड़ी होती हैं निचले पत्ते मोटे तौर पर अंडाकार होते हैं, आधार पर बड़े पालियों के साथ गहराई से घिरे होते हैं, उप तीव्र, पूरे और चमकदार ऊपरी पत्ते गहरे हरे रंग के होते हैं और छोटे पेटीले या लगभग सीसिल के साथ होते हैं पिप्पली के फल कई छोटे फलों से मिल कर बना होता है, जिनमें से हरेक एक खसखस के दाने के बराबर होता है भारत में इसकी पैदावार उष्ण प्रदेशों यथा बंगाल, बिहार, असम, पूर्वी नेपाल, कोंकण से त्रावणकोर तक पश्चिमी घाट के वन, मलेशिया, इण्डोनेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका तथा निकोबार द्वीप समूह में होती है। तमिलनाडु की अन्नामलाई पहाड़ियों तथा असम के चेरापूंजी क्षेत्र में इसकी खेती आन्ध्र के विशाखापत्तनम्‌ जिले के पहाड़ी इलाके में की जाती है।

यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है बड़ी और छोटी। वैसे निघण्टु में चार जातियां बताई जाती हैं- (1) पिप्पली (2) गज पिप्पली (3) सैंहली और (4) वन पिप्पली।

(1) पिप्पली – इस पिप्पली को मगधी अथवा मघई पिप्पली भी कहा जाता है। बिहार के मगध क्षेत्र में होने के कारण इसका नाम मगधी पड़ा है। पंजाबी भाषा में अभी भी पिप्पली को मघ’ ही कहा जाता है। वानस्पतिक जगत में इस पिप्पली को पाइपर लौंगम’ के नाम से जाना जाता है।

(2) वनपिप्पली – यह प्रायः वनों में उगती है। यह छोटी, पतली तथा कम तीक्षण होती है। इसे प्रायः पाइपर साइलवेटिकम के रूप में पहचाना जाता है। इसे बंगाली या पहाड़ी पिप्पली भी कहा जाता है। यह उत्तरी–दक्षिणी आसाम, बंगाल तथा वर्मा में अधिकता में पाई जाती है।

(3) सिंहली पिप्पली: इसे जहाजी पिप्पली भी कहा जाता है क्योंकि यह श्रीलंका तथा सिंगापुर आदि देशों से हमारे यहां आयात होती थी। इसे पाइपर रिट्रोफैक्टम’8 के रूप में जाना जाता है।

(4) गज पिप्पली: इस पिप्पली के बारे में कई भ्रांतियां हैं तथा कई वैज्ञानिक इसको चब्य का फल मानते हैं। उपरोक्त में से प्रथम तीन प्रकार की पिपपलियों को अलग-अलग द्रव्य नहीं माना जाता तथा इन सभी को पिप्पली अथवा पाइपर लौंगम के रूप में पहचाना जाता है।

पौध वितरण: –
पिप्पली इंडो-मलाया क्षेत्र की मूल निवासी है।
यह भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उगाया जाता है |

पिप्पली की कृषि तकनीक

जलवायु और मिट्टी: –

(1) पौधे को गर्म, नम जलवायु और 100 से 1000 एम् एस ऐल के बीच ऊंचाई की आवश्यकता होती है |
(2) जैविक पदार्थ (ह्यूमस) से भरपूर अच्छी तरह से सूखा लाल, दोमट मिट्टी खेती के लिए अनुकूल है|
(3) यह 30 – 32 डिग्री सेल्सियस तापमान एवं 150 सेमी वार्षिक वर्षा के साथ 60% आर्द्रता वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से पनपता है|

भूमि की तैयारी :-

क्षेत्र को दो से तीन बार जोतना चाहिए और ठीक से समतल करना चाहिए |
क्यारियों का आकार 3 मीटर x2.5 मीटर तैयार किया जाता है और गड्ढों को 60 सेमी x 60 सेमी की दूरी पर खोदा जाता है |
मिट्टी के साथ सूखे गोबर को 100 ग्राम प्रति गड्ढे की दर से मिश्रित किया जाता है |
प्रत्येक गड्ढे में जड़ों के साथ दो कटे हुए कटिंग या चूसक लगाए जाते है |
क्यारियों में किसी भी पानी के ठहराव से बचने के लिए, चैनलों को अतिरिक्त बारिश के पानी की निकासी के लिए स्थान रखा जाता है |

पिप्पली का प्रवर्धन

पिप्पली का प्रवर्धन बीजों से भी किया जा सकता है, सकर्स से भी, कलमों से भी तथा इसकी शाखाओं की लेयरिंग करके भी। वैसे व्यवसायिक कृषिकरण की दृष्टि से इसका कलमों द्वारा प्रवर्धन किया जाना ज्यादा उपयुक्त होता है। इसके लिए सर्वप्रथम इन्हें नर्सरी में तैयार किया जाता है।

नर्सरी बनाने की विधि :- पिप्पली की नर्सरी बनाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय फरवरी-मार्च माह होता है। इस समय पुराने पौधों की ऐसी शाखाएँ जो 8 से 10 से.मी. लम्बी हों, तथा जिनमें से प्रत्येक में 3 से 6 तक आंखें (नोड्स) हों, काट करके पॉलीथीन की थैलियों में रोपित कर दी जाती है। रोपाई से पूर्व इन थैलियों को मिट्टी, रेत तथा गोबर की खाद (प्रत्येक का 33 प्रतिशत) डाल करके तैयार किया जाता है। थैलियों में रोपण से पूर्व इन कलमों को गौमूत्र से ट्रीट कर लिया जाना चाहिए। इन पौलीथीन की थैलियों को किसी छायादार स्थान पर रखा जाना चाहिए तथा इनकी प्रतिदिन हल्की सिंचाई की जानी चाहिए। लगभग डेढ़ से दो महीने में ये कलमें खेत में लगाए जाने के लिए तैयार हो जाती है।

निंदाई-गुड़ाई :- पहले वर्ष में नियमित निराई करनी चाहिए और जब खरपतवार की वृद्धि देखी जाती है क्यारियों में तुरंत करनी चाहिए।

खाद व उर्वरक: – पिप्पली को भारी खाद की जरूरत होती है, 1 हेक्टेयर लिए बीस टन गोबर खाद की आवश्यकता होती है, चूँकि फसल 3 साल तक आर्थिक पैदावार देगी, इसलिए खाद की जरूरत प्रत्येक वर्ष किया जाना चाहिए।

सिंचाई:- सप्ताह में एक बार आवश्यक करनी है।

फसल काटना :- रोपण के लगभग पांच-छ: माह के उपरान्त पौधों पर फल (स्पाइक्स) बनकर तैयार हो जाते हैं। जब ये फल हरे-काले रंग के हों तो इनको चुन लिया जाता है।

उपज :- पहले वर्ष के दौरान शुष्क स्पाइक की उपज लगभग 400 किलोग्राम / हेक्टेयर होती हे।

यह तीसरे वर्ष में 1000 किग्रा / हेक्टेयर तक बढ़ जाती है , तीसरे वर्ष के बाद बेलें कम उत्पादक होती हैं अतः पुनः उगाना चाहिए |

पिप्पली की रासायनिक संरचना

पिप्पली के सूखें फलों में 4 से 5 प्रतिशत तक पाइपरीन तथा पिपलार्टिन नामक एल्केलाइड पाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त इनमें सिसेमिन तथा पिपलास्टिरॉल भी पाए जाते हैं। पिप्पली की जड़ों में पाइपरिन (0.15 से 0.18 प्रतिशत) पिपलार्टिन (0.13 से 0.20 प्रतिशत) पाइपरलौंगुमिनिन (0.2 से0 0. 25 प्रतिशत) तथा पाइपर लौंगुमाइन (0.02 प्रतिशत) पाए जाते हैं। इसमें एक सुगंधीय तेल (0.7 प्रतिशत ) भी पाया जाता है। जो कालीमिर्च तथा अदरक के तेल जैसी खुशबू लिए होता है।

उपयोग: यह पाचक अग्नि बढ़ाने वाली, वृष्य, पाक होने पर मधुर रसयुक्त, रसायन, तनिक उष्ण, कटु रसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा कफ नाशक, तथा श्वास रोग, कास (खांसी), उदर रोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर, प्लीहा, शूल और आमवात नाशक है।

संदर्भ
https://hindi.webdunia.com/article/natural-medicine/पीपल-पिप्पली-107041800040_1.htm
https://hi.wikipedia.org/wiki/पिप्पली
http://agritech.tnau.ac.in/horticulture/horti_medicinal%20crops_tippili.html
https://www.nmpb.nic.in/sites/default/files/publications/long_pepper_pippal.pdf